Monday, April 15, 2013

ग़ज़ल

जहाँ तू बज़्म में बैठा रहेगा
वो कोना आईना बनता रहेगा 

हवा की चाह है बुझना पड़ेगा
दीये की जिद है वो जलता रहेगा

 यहाँ पर नामो-शोहरत की घुटन है
 यहाँ क्या आदमी जिन्दा रहेगा 

 उसे ऊँचाइयों से क्या हो हाशिल
 गिरेगा तो ही ये झरना रहेगा 

 वो पिछली बारिशों का है सताया
 सिराहने जिसके ये छाता रहेगा

 जिसे हो रास आयी हुक़्मरानी
 वो किसका है भला तेरा रहेगा 

तिरी यादें कहाँ तक साथ देंगी 
सफर में साथ ये छाला रहेगा 

ये पत्थर भी यहाँ पर बोलते हैं
तू है 'निस्तेज' तू गूंगा रहेगा 

 निस्तेज