घर हमारे रोज दीमक खा रहे हैं
"ठीक है सब" आप क्या फरमा रहे हैं
बंद है ये द्वार कबसे इन् घरों के
खिडकियों से क्यों बुलावे आ रहे हैं
बाढ़ में डूबा कभी था बाग ये ही
आज बादल क्यों इसे तरसा रहे हैं
संगदिल है यार कितना पूछिए मत
ये तो हम हैं प्यार करते जा रहे हैं
बुद्ध , जिनसे मैनें सिखी प्रेमगीता
आज वो बन्दूक क्यों उठवा रहे हैं
चीर डाला, फाड डाला, मार डाला
इस 'भुवन' में जाने वो क्या पा रहे हैं
निस्तेज
No comments:
Post a Comment