Friday, October 14, 2011

ग़ज़ल

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ग़ज़ल
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साज़े दिल धुन छेडता है दर्द की
अब ग़ज़ल ही है दवा हर मर्ज़ की

जब से मैनें पैरवी की सत्य की
तब से उसने बात करनी बन्द की

ये अँगुलीमाल है इस दौर के
काट लेंगे उंगलियाँ ये बुद्ध की

पेड़ तक है किस सलीके से खड़े
आहटें कुछ खास है नेपथ्य की

सामने है प्रेम की विरदावली
पीठ पीछे है तैयारी युद्ध की

खेत सींचा, ना तो बिजली ही मिली
आपने नाहक नदी अवरुद्ध की

हर ग़ज़ल की थी समर्पण आपको
हर ग़ज़ल फिर आप ही ने रद्द की

शौक रखते पर-पीड़ा का जो 'भुवन'
उनको सूझे और किस आनन्द की

वो हमें 'निस्तेज' कहकर जो गये
थी कहानी 'टाट के पैबन्द' की ।
===================निस्तेज

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